Red Paper
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2025, Vol. 7, Issue 4, Part C


हिंदी कथा-साहित्य में नारी मनोविज्ञान और सामाजिक यथार्थ: संतोष गोयल के रचनात्मक परिप्रेक्ष्य में


Author(s): Monika Dalal

Abstract: हिंदी कथा-साहित्य में नारी मनोविज्ञान और सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति एक महत्त्वपूर्ण विषय रहा है, जिसमें स्त्री की भावनात्मक, मानसिक और सामाजिक स्थितियों को सूक्ष्मता से प्रस्तुत किया गया है। संतोष गोयल ने अपने कथा-साहित्य में नारी को केवल एक सामाजिक इकाई नहीं, बल्कि एक जागरूक, आत्मनिर्भर और संघर्षशील व्यक्ति के रूप में चित्रित किया है। उनके उपन्यास धराशायी, रेतगार, सूर्यरागिनी और पुतलघर में नारी पात्रों के माध्यम से स्त्री के अंतर्द्वंद्व, आत्मबोध, शोषण और प्रतिरोध को यथार्थपरक ढंग से उजागर किया गया है। उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों, पारिवारिक बंधनों और पुरुषसत्तात्मक व्यवस्था के बीच स्त्री की अस्मिता की खोज को साहित्य का केंद्रीय विषय बनाया है। कथा-साहित्य के माध्यम से लेखिका यह स्थापित करती हैं कि नारी केवल करुणा और सहानुभूति की पात्र नहीं, बल्कि बदलाव की वाहक भी है। उनका साहित्य नारी चेतना, समाज की क्रूर संरचना और मानसिक संघर्षों के बीच स्त्री के आत्मविश्वास और स्वत्व की स्थापना करता है। इस शोध का उद्देश्य नारी के मनोविज्ञान के साथ-साथ सामाजिक यथार्थ के द्वंद्व को संतोष गोयल की दृष्टि से विश्लेषित करना है, जिससे साहित्य के माध्यम से सामाजिक चेतना को विस्तार मिले। उनके रचनात्मक परिप्रेक्ष्य ने हिंदी कथा-साहित्य को एक नई दृष्टि और विचारधारा प्रदान की है।

DOI: 10.33545/27068919.2025.v7.i4c.1555

Pages: 287-290 | Views: 897 | Downloads: 234

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How to cite this article:
Monika Dalal. हिंदी कथा-साहित्य में नारी मनोविज्ञान और सामाजिक यथार्थ: संतोष गोयल के रचनात्मक परिप्रेक्ष्य में. Int J Adv Acad Stud 2025;7(4):287-290. DOI: 10.33545/27068919.2025.v7.i4c.1555
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