Red Paper
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2025, Vol. 7, Issue 3, Part B


मिथिला संस्कारों की भूमि


Author(s): प्रगति झा

Abstract: भारतीय संस्कृति के विविध आयामों में मिथिला का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। यह क्षेत्र केवल अपनी विद्वत्ता और तंत्र-मंत्र साधना के लिए ही प्रसिद्ध नहीं रहा, बल्कि अपने गहन और विशिष्ट संस्कारों की परंपरा के कारण भी विशिष्ट पहचान रखता है। मिथिला में प्रचलित संस्कार वैदिक परंपरा से अनुप्राणित हैं, परंतु उनमें स्थानीय परंपराओं और लोकजीवन की झलक भी स्पष्ट दिखाई देती है। यही कारण है कि मिथिला को संस्कारों की भूमिकहा जाता है। मिथिला में जन्म से मृत्यु तक प्रत्येक संस्कार को विशेष महत्त्व दिया जाता है। विवाह संस्कार यहाँ की सांस्कृतिक अस्मिता का सबसे बड़ा प्रतीक है, जिसमें कन्यादान, पाणिग्रहण, लाजहोम, सप्तपदी और विदाई जैसी विधियों का पालन आज भी गहरी आस्था के साथ होता है। उपनयन संस्कार में गायत्री मंत्र और गुरु-शिष्य परंपरा की पवित्रता दिखाई देती है। इसी प्रकार, श्राद्ध संस्कार में पितरों के प्रति श्रद्धा और उत्तरदायित्व का भाव प्रकट होता है। इन सभी संस्कारों ने मिथिला समाज को नैतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अनुशासित और संगठित बनाए रखा। यह शोधपत्र मिथिला में प्रचलित संस्कारों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, उनके विशिष्ट रूप और वर्तमान समाज में उनकी प्रासंगिकता का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि मिथिला के संस्कार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि वे लोकजीवन की आत्मा हैं। वे सामाजिक एकता, पारिवारिक स्थायित्व और सांस्कृतिक निरंतरता के वाहक हैं। इसलिए मिथिला को सही अर्थों में संस्कारों की भूमि कहा जा सकता है।

DOI: 10.33545/27068919.2025.v7.i3b.1746

Pages: 166-169 | Views: 175 | Downloads: 84

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प्रगति झा. मिथिला संस्कारों की भूमि. Int J Adv Acad Stud 2025;7(3):166-169. DOI: 10.33545/27068919.2025.v7.i3b.1746
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