2024, Vol. 6, Issue 12, Part B
दिनकर की राष्ट्रीय-चेतना
Author(s): संगीता कुमारी
Abstract: हिन्दी साहित्य में दिनकर की पहचान राष्ट्र कवि के रूप में है । उनका साहित्य राष्ट्रीय-जागरण व संघर्ष के आहान का जीता-जागता दस्तावेज है । दिनकर जी के यहाँ राष्ट्रीय-चेतना कई स्तरों पर व्यक्त हुई है ।
हुंकार, रेणुका, इतिहास के आँसु जैसी कविताओं में दिनकर जी ने विद्रोह और विप्लव के स्तर को ऊभारा है । इनमें कर्म, उत्साह, पौरुष एवं उत्तेजना का संचार है । यह सब तत्कालीन राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रगति के लिये अत्यंत सहायक सिद्ध हुआ । दिनकर जी के यहाँ राष्ट्रीय चेतना एक अन्य स्तर पर वहाँ दिखाई देती है, जहाँ वे शोषण का प्रतिकार करने का समर्थन करते हैं । वे कहते हैं कि यदि कोई हमारे साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार करे तो नैतिकता का तकाजा युद्ध करना ही है न कि अनैतिकता को स्वीकार करना-
“छीनता हो स्वत्व कोई और तू
त्याग तप से काम ले, यह पाप है ।”
DOI: 10.33545/27068919.2024.v6.i12b.1643Pages: 129-132 | Views: 1157 | Downloads: 448Download Full Article: Click Here